Tuesday, 22 December 2015

सर्वव्यापी


कुहासे की घनी चादर
मानों स्याह घूंघट कायनात का
एक कोने से जरा सा सरकाकर
झांक उठी किरणें
अहा ! अद्भुत
निगाह हटाने का जी नहीं होता
आंखों से पीता है मन
इस सुंदरता को
घूंट घूंट
थोडा थोडा सरकता जाता है ओढ्ना यह
जैसे ढलकता है घूंघट दुल्हन का
खुलता जाता है रूप
खिलती जाती है आभा
अहा ! अद्भुत
कोमल गुलाबी सुनहरा झालर
चमचम करता
मोहता है मन
सर्वव्यापी
तुम ही तो हो हर तरफ
और कौन होगा भला इतना मोहक
इतना गुरुत्व भरा
खिंचा जाता है सर्वस्व मेरा
अहर्निश ……………


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