Tuesday, 22 July 2014

घरौंदा

छोटी सी थी
तब मिट्टी का घरौंदा
बनाया करती थी
तिनकों से सजाकर ही
गर्व से निहारा करती थी
कितना सुख मिलता था
उस कच्ची मिट्टी के घरौंदे को
देख देख कर……

अब जो बनाया है
वह भी तो घरौंदा ही है
मिट्टी का न सही
ईंट बालू सीमेंट का ही सही
मार्बल और ग्रेनाइट का ही सही

सजाया भी है
रंग रोगन से
झाड फानूस से
तरह तरह के चित्र नक्काशियों से
क्या फर्क पडता है

हां फर्क आ गया है
इसे देखकर मिलने वाले सुख में
घरौंदे के मुकाबले सुख छोटा
लगने लगा
संतोष की वो चरम अनुभूति
नहीं मिलती
खुशी की वो किलकारियां नहीं निकलतीं

हम तो वही हैं
घरौंदा भी कमोबेश वही है
फिर फर्क कहां है
शायद हम ही भूल गये
छोटी छोटी बातों में खुश होना
किलकना
शायद हम ही भूल गये
जीना
जीने के कायदे…………


मैं हूं आपका शहर

मैं हूं आपका शहर----------
आपकी जन्म भूमि
आपकी कर्म भूमि
आपके बचपन की किलकारियां सुनी है मैंने
आपको शनै: शनै: बढते देखा है
आपके स्कूल की रिपोर्ट देखकर
मम्मी पापा के साथ साथ खुश हुआ हूं
मैं बेहद खुशनसीब हूं
चहुं ओर से नदी पहाड घेरे हुये हैं मुझे
तीन तरफ़  शक्ति पीठ हैं मेरे
हरियाली पग पग पर
हजारों बाग थे पहले यहां
इसीलिये तो मेरा नाम हज़ारीबाग हुआ
वन सम्पदा अकूत
सुंदरता अद्भुत
जलावायु यहां की सुखद
न ज्यादा शीत न ज्यादा धूप
अपको भी अच्छा लगता हूं न मैं
यहां के वाशिंदे कहते हैं
कि हवा ही मीठी है हमारे शहर की
बस एक खटक सी है
एक गिला एक अरज
आपके फ़ेंके हुये कचरे
मेरे बदन पर घाव बनकर दुख देते हैं
आप बस उन्हें कहीं एक ठिकाना बना कर रखें
वर्षा रानी आ ही रही
मुझे नहला धुला कर साफ़ कर देगी
मैं कष्ट मुक्त हो जाऊंगा
फ़िर से खूबसूरत
फ़िर से स्वच्छ फ़िर से  मनहर
मैं हूं आपका प्यारा शहर--------------



कोशी कहती है

फ़िर आने को है बरसात
मैं मन ही मन डरी हुई हूं
मेरी अथाह जलराशि
मेरी सन्तानों को घर से बेघर न कर दे
मैं तो मां हूं
भला अहित कैसे चाहूंगी किसी का भी
मेरा भी जन्म अन्य नदियों की तरह
ही हुआ है
नन्हें से झरने के रूप में
मैं पर्वत से उतरी हूं
जलप्रपात बन निर्भीक मचलती
रास्ते के अवरोधों को आप ही ढकेलती
राह बनाती आयी हूं
मेरा तो सर्वस्व ही जीव मात्र की प्यास
बुझाने को प्रस्तुत रहता है
खेत खलिहान
पंछी पशुधन कीट पतंग़
सभी मेरी संतान हैं
मुझे थोडा सा सहारा देकर
मेरी धारा को बांट संभाल कर
इस्तेमाल करे इंसान
तो न आप दुखी हो न मुझे दुख दे
मैं भी तो नहीं चाहती कोई कहर ढाना
मेरे आस पास रहने वालों
मेरी यही है करबद्ध प्रार्थना
अपनी हिफ़ाजत आप कर लो

मुझे किसी भी कलंक से बचा लो……।

अच्छा लगता है

यूं तो जीने के कायदे
एक हजार हैं
कभी कभी बेकायदे
जीते जाना अच्छा लगता है

यूं तो तय है
मंजिल भी
हर एक  राह की
कभी कभी अनजान राह पर
चलते जाना अच्छा लगता है

तीखी धूप से बचके चलना
दुनिया कहती है
उसी धूप में छांव खोजकर
पल भर रुकना
अच्छा लगता है

जैसा मौसम वैसा करना
रीत है दुनिया की
कभी कभी मौसम से उलझना
अच्छा लगता है

यूं तो हंसने गाने के भी
अपने तरीके हैं
कभी कभी बेबात के हंसना
अच्छा लगता है

घने मेघ छाए
जब नभ पर
हवा चले हल्की हल्की
अपने आप से बातें करना
खोए खोये गुमसुम रहना
अच्छा लगता है………


तीस्ता की धारा में

अद्भुत नजारा है
कुछ ज्यादा ही चमकीला
कुछ ज्यादा ही बडा चांद
है आसमान में
गुरू पूर्णिमा की रात है

अपूर्व सुन्दरी तीस्ता
इठलाती हुई बह रही
रौशनी में नहाकर
समूची धारा सुनहरी हो रही है

जब आधी रात हो चली
गगन से
धीरे धीरे फिसलता हुआ
चांद नदी के पास आया
बहुत पास
मानों जल के दर्पण में
मुख देखना चाह रहा हो

जब  सारी कायनात सो गयी
चुपके से कोई बात
कहना चाह रहा हो

धीरे से चंदनी की बांहें फैलाकर
ज्यों ही
छुआ उसने
जाने नदी ने क्या कहा उसके कानों में
खिलखिलाता हुआ वापस लौट चला

सबेरे दुनिया वालों ने
दूर आसमान में
उसे मुस्कुराते हुए देखा
कुछ खास बात थी आज
चांद की आभा में


चंचला तीस्ता भी बहती है
आज कुछ शरमाई सी
जाने क्या घुल गया
आज
उसकी जलधारा में…………



सात समुन्दर पार से

सात समुन्दर पार से
गुडियों के बाजार से…
कानों में गाने के बोल गूंज रहे
और पनीली आंखें
शून्य में तुम्हें ढूंढ रहीं
कहां खो गए तुम
बाबा !
चार पंक्तियों की
कविता लिखकर चारों दिशाओं में
घूमती फिरती हूं
किसे दिखाऊं
किसे सुनाऊं
कौन कहेगा सुनते ही
कैसे लिखी…
यह तो मेरे गांव की कहानी है
तुम्हें कहां से मिली …?

तुम्हारी उंगली थामकर
चलने वाली आज
अतीव व्यस्तता के बावजूद
हर तरफ
खाली खाली महसूस करती है

तुम्हारा खाली कमरा
तुम्हारी खाली कुर्सी
दीवार पर टंगी
तुम्हारी हंसती हुई तस्वीर
मन को कचोट कर रख देती है

काश मैं तुम्हारी बेटी न होकर
बेटा होती
तुम मुझे विदा न करते
यूं मुझे खुद से जुदा न करते

बचपन की हजारों यादें
मुझे गाहे बगाहे
रुलाया करती हैं
मेरे ऊन के गोले सुलझाना
मेरे याद किए हुए पाठ को सुनना
सुबह सबेरे मुझे जगाये जाने पर
अम्मा से रोज रोज उलझना

बाबा
अब तो रोज ही जागती है तुम्हारी दुलारी
मुंह अंधेरे
उनींदी रहे या अलसायी
कौन देखता है

एक तस्वीर मांग कर अम्मा से
लायी हूं
छोटी सी थी मैं
तुम्हारी उंगली दोनों हथेलियों से
कस कर थामे
डरी सहमी सी
शायद जानती थी तभी
कि छुडा लोगे हाथ मेरा
चले जाओगे दूर कहीं
सात आसमान  के पार

फिर बस सपनों में आने के लिए……।