Friday, 2 December 2011

आंखों की खता



बारिश होकर
थम भी चुकी है
सूरज की आभा
चारों तरफ़ फ़ैल रही है
धुला धुला सा गगन
और भींगी भींगी धरती ,
हवा भी गुनगुनी सी बह रही है
सामने
घास के मैदान में
ठहर गए थोडे से पानी में
गोल गोल तरंगें उठ रही हैं
शीशे की तरह
साफ़ झलकते पानी में
तुम्हारा चेहरा
मुस्कुराता दीख रहा है
हैरान हूं
यह तुम हो
या मेरी आंखों की खता है
जो हर वक्त ,हर जगह
बस तुम्हें ही ढूंढती रहती है…

बूंद बूंद कर


बूंद बूंद कर
सागर भर जाता होगा
हर बूंद यहां एक घूंट
प्यास की बन जाती है…

जितना तुमको देखूं
और आंखों में भर लूं
उतनी ही आंखों की चाह
बढी जाती है…॥

जितना तुमसे मिलूं
और बातें मैं कर लूं
उतनी ही फ़िर मिलने की
इच्छा जगती है…

प्यार भरी बातों से तेरे
मन भरता है
लेकिन फ़िर भी प्यास
अधूरी ही रहती है……

बूंद बूंद कर
सागर भर जाता होगा
हर बूंद यहां एक घूंट
प्यास की बन जाती है……।!

Thursday, 1 December 2011

जो मन कहता, सो वह कहता.........


इस चीड वृक्ष की शाखों में
है किसका मन
खोया-खोया
है कौन छुपा इनके पीछे
ऐ चित्रकार
तू देख जरा...
है किसके रुह की आभा यह
इतनी उजली
इतनी शीतल
है सबमें उस स्रष्टा की झलक
बस मूँद पलक
और देख ले तू.........
इस पर्वत के चप्पे चप्पे...
इस निर्झर की
हर बूँदों में,
इस सरिता की धारा में भी
और साँझ सुबह की लाली में
कोमल पंखों पर है खग के  
और हिरन की चौकड़ियों में भी
वो कहाँ नहीं
वो हरेक जगह
वो गगन में है ,
वो घटा में भी
वो जमीं पे है
वो जल में भी......
वो मन में है, वो वन में है
इस जग का है
वह रखवाला
उसने ही कायनात रची
उसने हमको सुंदर ढाला...
खुली नजर गर ना दीखे
बस आँख मूँद,
महसूस सदा....
फ़ूलों में भी खुशबू में भी
नीँद में भी सपनों में भी
मुझमें है
तुझमें भी है
वह कुछ भी नहीँ
वह सब कुछ है
भले बुरे कर्मों में भी
मन में उठते भावों में भी
यह चीड़ वृक्ष ही एक नहीं
सारे जग में उसकी ही झलक
इतना कोमल इतना रसमय
इतना निर्मल
इतना मदमय
प्यार भरे हर दिल में तो
होता रहता एहसास सदा
आओ मिलकर हम ध्यान करें
उसका दिल से एहसान करें
कि उसने बनाया
है हमको
तो मानें उसकी बात सदा
अब मत पूछो वह क्या कहता
जब मन के भीतर वह ही है
जो मन कहता, सो वह कहता.........


Monday, 28 November 2011

सिर्फ़ तुम्हारे लिए


कह तो दिया तुमने
कि तुम्हें मैंने
खींचकर निकाल दिया है
उस सात दीवारों के बंद कमरे से
जहां कैद थी तुम्हारी
मुस्कुराहट…
तुम्हारा खुलापन
तुम्हारे सपने देखने की आदत
और्…
आज़ाद परिन्दे की तरह
मनचाही ड्गर,
मनचाही दिशा में
फ़डफ़डाकर उड जाने की चाहत…

कर भी लिया तुमने मुझसे वादा
कि भींगोगे बारिश की बूंदों में
महसूस करोगे गिरती बूंदों की
शीतल तपिश…
और फ़िसलते देखोगे उन्हें
अपने बदन पर आहिस्ता आहिस्ता…
और यह भी कहा कि
बटोरते  रहोगे  खुशियां
यहां से,वहां से
सृष्टि के चप्पे चप्पे से
अंजुलि भर भर कर
और बांटते रहोगे
उन्हें मुट्टी भर भर कर अनवरत……

जन्मों की प्यास जो थी
आत्मा में कैद
तुमने उसे भी मुक्त करने की
कोशिश की
दौडे चले आए
कई कई बाधाओं को रोकते
धकेलते…
जमाने की अनगिन निगाहों से
खुद को संभालते
और पा भी लिया मैंने
चंद लम्हों में
कितने ही सवालों के जबाब
तुम्हारी निश्छल निगाहों में
और उनके भी पार
पलकों की कोरों में छुपते
कुछ मोतियों में………
तुम्हारी उंगलियों के पोरों के
निर्मल स्पर्श में
तुम्हारी धीर गम्भीर आवाज़ की कशिश में
और शांत सौम्य व्यवहार में
मेरे सुदर्शन दोस्त…!
मुग्ध हो गयी मैं तो………

पर जब जब मैंने निगाहें उठाई
जाने क्यों ऐसा लगा
कि मेरे इतने करीब होकर भी
तुम कहीं दूर हो
तुम्हारे मन का कोई कोना
अछूता ही रहा
उसके बंद दरवाजे
खोल नहीं पाई मैं
अभी और भी ढूंढना है तुमको
तुममें ही………
देखना है मुझे तुम्हारा बीता हुआ कल
महसूस करना है दर्द उन पीडाओं का
जो गाहे बगाहे
टीसते हैं तुम्हारे ह्रदय में
मिटा देना है उनके
हल्के से हल्के निशान भी
और रोप देना है उनपर
अमर प्रेम की बेल
स्निग्ध प्यार की दूब…

देखना है मुझे तुम्हें
तुम्हारे चंचल ,वाचाल
निर्भीक उन्मुक्त रूप में
जो बात बेबात खिलखिला उठे
और झर उठे हंसी के फ़ूल
मुझे देखना है तुम्हें
बिल्कुल निर्झर की तरह झरते
कि गूंजे तुम्हारे कंठस्वर
दसो दिशाओं में
रंग और कूची तुम्हारी
उतारती रहे अनगिनत तस्वीर
वक्त के कैनवस पर………

और जब भी मिलो मुझसे
उसी बाल सुलभ अंदाज़ में
दौडकर,गले लगकर
जैसे बरसों पहले मिले थे
एक भींगी भींगी रात में
जब पकडकर बिजली का खंभा
गोल गोल घूमते रहे थे हम-तुम
और अचानक उल्टा घूमकर
तुमने भर लिया था मुझे बांहों में
और पल भर में मेरी आत्मा
निकलकर मेरे शरीर से
समा गई थी तुममें

उसी दिन की तरह
जब जाडे की गुनगुनी धूप में
मैदान की हरी घास पर
हाथ पकडकर बैठे रहे थे हम तुम
सुबह से शाम हो आई थी
झरते रहे थे फ़ूल हमारे माथे पर
मानों देता रहा हो आशीष
अपने अनगिन बाजुओं से
पास ही खडा गुलमोहर का पेड…
और खोए रहे थे हम तुम
एक अनबूझ नशे में

ठीक उसी शाम की तरह दोस्त…
जब सागर तट पर अकेले खडे
जाने किन खयालों में गुम थे तुम
कि अचानक मैंने तुम्हारे कंधे को छुआ था
चौंक से गए थे तुम
फ़िर जब मैंने
तुम्हारा हाथ धीरे से थाम लिया
चल पडे थे तुम मेरे साथ दूर तक
लहरों में धीरे धीरे
और शाम के गहराते ही
अचानक जाने क्या सूझी
तुमने डाल दी मेरे गले में बांहें
और निहारने लगे अपलक मेरी निगाहों में

वैसे ही साथी
ठीक वैसी ही कशिश
वैसी ही तपिश
वैसा ही प्यार वैसा ही उन्माद
देखना है मुझे तुममें
आज भी ,कल भी
हर पल,हर घडी…
फ़िर मिलूंगी तुमसे
बार बार मिलूंगी
सौ बार मिलूंगी
तुम्हें छूकर,तुम्हें महसूस कर
फ़िर से जीऊंगी उन बीते लम्हों को
जो भुलाए  नहीं जा सकते
पर दुहराए तो जा सकते हैं,,,,,,,,,!

Saturday, 29 October 2011

फ़िर मैं कहां अकेली हूं


कभी कभी ऐसा लगता है
कि मैं बहुत अकेली हूं
और कभी ऐसा लगता है
जैसे एक पहेली हूं
मन के सातों द्वार खोलकर
जब भीतर पग धरती हूं
उस चित्रकार के चित्रों को
जब सांगोपांग निरखती हूं
रंग भरी यह अद्भुत दुनिया
अचरज से भर देती है ,
मन कहता रंगों की दुनिया
की मैं एक रंगोली हूं
और कभी जब वीणा के
तारों से बातें करती हूं
अंतर में झंकार सी उठती
एक अवाज़ सी सुनती हूं
सातों सुर हैं मां- जाए
और मैं उनकी मुंहबोली हूं
राग रागिनियां संग हैं मेरे
फ़िर मैं कहां अकेली हूं…॥

Thursday, 27 October 2011

कह नहीं सकती


     प्रेम की भाषा
     मुखरित हरदम
     बाकी सब परिभाषा गौण…      
     कह नहीं सकती
     हम दोनों में
     धूप कौन है ,छाया कौन ?

     भोर जगाती
     हम दोनों को
     किरणों के हरकारे भेज
     सांझ सजाती
     चांद सितारे लेकर
     सुख सपनों की सेज

     हाथ थाम कर
     चला किए हम
     ऊंची नीची राहों पर
     सुख दुख के हर लम्हे झेले
     हमने हरदम
     मिल जुल कर

     मैं रोई तो आंसू मेरे
     उसकी आंखों में 
     भी छलके
     मेरे मन की
     खुशहाली में
     हुआ प्रफ़ुल्लित जी भरके

     यूं तो अपना रिश्ता अद्भुत
     कई कई जन्मों
     का है साथ
     हे ईश्वर इतनी विनती है
     कभी न छूटे अपना हाथ

     खुशियां बाटें कभी न सोचें
     अपना कौन पराया कौन…
     कह नहीं सकती
     हम दोनों में
     धूप कौन है छाया कौन…??
                           

Monday, 24 October 2011

फ़ूलों के देश में


             कोई तडप के पुकारे ,
             दोनों बांहें पसारे ,
             मैं दौडी चली आऊं
             अपना तन-मन लुटाऊं…
             जैसे कलियां लुटाती हैं
             भौरों की धुन पर
             तन-मन सारा
             परागों के वेश में
             फ़ूलों के देश में………।